#राममंदिर के बारे में #राजनीति

#राममंदिर के बारे में #राजनीति को समझने की जरूरत है…
राम मंदिर एक बार फिर ख़बरों में है. अब देश में राम मंदिर के मुद्दे पर कॉन्फ्रेंस, रैली और कई कार्यक्रम हो रहे हैं.
आने वाले दिनों में राम मंदिर के मुद्दे पर कई कार्यक्रम अयोध्या में भी देखने को मिलेंगे.

ऐसे में सवाल ये है कि क्या देश में फिर ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं, जो अब से क़रीब 30 साल पहले थे? अगर ऐसा हुआ तो इसके नतीजे क्या होंगे?

कुछ सवाल, जिनके जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं
अगर अतीत की ओर लौटते हैं तो कुछ सवालों के जवाब खोजना दिलचस्प हो सकता है.

मसलन, अयोध्या मुद्दे पर इस दौर के नए आडवाणी और वाजपेयी कौन होंगे? इस मुद्दे से होने वाले फ़ायदों को कौन भुनाएगा?

सबसे अहम बात ये कि अयोध्या के मुद्दे पर भारतीय राजनीति किस ओर बढ़ेगी?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई.

6 दिसंबर 1992 की वो तारीख़
1992 के दिसंबर महीने की छह तारीख़. अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद राम जन्मभूमि आंदोलन की रफ़्तार कम हो गई.

इसके बावजूद अयोध्या की यादों को बचाए रखने की कोशिशें हुईं. फिर चाहे नींव पूजन समारोह हो या मंदिर निर्माण के लिए योजना बनाना हो. हर साल छह दिसंबर को मनाया जाना वाला जश्न इसी कड़ी का अहम हिस्सा है.

राम मंदिर पर कोर्ट की तारीख़ें इस मुद्दे की यादें लोगों में बनाए रखती हैं.

लिब्राहन कमीशन को इस मामले की जांच सौंपी गई थी. ये जांच लंबी चली कि ये मुद्दा आए रोज़ ख़बरों में बना रहा.

आरएसएस एक बार फिर राम मंदिर का मुद्दा उठाकर विवाद क्यों खड़ा करना चाह रहा है?

ये संभव ही नहीं है कि इस मुद्दे को इतनी आसानी से सुलझा लिया जाए. ख़ासकर तब जब राम मंदिर से जुड़े कई केसों पर सुनवाई बाकी है.

बीते चार सालों से ‘लव जिहाद’ और गोरक्षा का मुद्दा लगातार हिंदू संगठनों के बीच सुलग रहा है. ये साफ़ गणित है कि अयोध्या के मुद्दे को आगे रखकर धार्मिक भावनाओं के ज़रिए हिंदुत्ववादी राजनीति की जाए.

भारत की बहुसंख्यक आबादी हिंदू है. ये पुराना सियासी गणित है कि अगर हिंदुओं को एकजुट रखकर अपने पाले में रखा जाए तो चुनावी नतीजे अपने पक्ष में आ सकते हैं.

राम के नाम पर अचानक शुरू हुई राजनीति यकीनन अगले चुनाव को ध्यान में रखते हुए शुरू हुई है.

आरएसएस के लिए सांस्कृतिक सत्ता पर काबिज होना सरकार चलाने जितना ही महत्वपूर्ण है. इस एजेंडे के तहत काम करने के मामले में संघ फिलहाल अभूतपूर्व स्थिति में है.

फिलहाल जो कोशिशें होती दिख रही हैं, वो राम मंदिर के मुद्दे पर आडवाणी स्टाइल की राजनीति को आगे बढ़ाने जैसी हैं.

कोई भी उलझी हुई राजनीतिक हलचल अपने लक्ष्यों और काम को लेकर स्पष्ट नहीं रहती है. ऐसे में मौजूदा हलचल की कई और परतें हैं.

हिंदुत्ववादी ढांचे और संघ में कई तरह के लोग होते हैं. एक वो जो सियासी गणित को ध्यान में रखकर राजनीति करते हैं. ऐसे भी लोग हैं, जो शांति से काम करते हुए संस्कृति की राजनीति करते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो राष्ट्रवादी हिंदू हैं.
ऐसे भी लोग हैं, जो वाक़ई ये मानते हैं कि राम मंदिर सिर्फ़ बीजेपी सरकार के दौरान ही बन सकता है. ये लोग राम मंदिर को बीजेपी सरकार की ज़िम्मेदारी मानते हैं. इसे श्रेणी में ज़्यादातर लोग शहरी हिंदुत्ववादी हैं.

हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति का एक अहम पड़ाव तब पूरा हुआ था, रामजन्म भूमि का मुद्दा आगे बढ़ा. इस दौर में ‘हिंदू आइडेंटिटी’ जाति से ऊपर रही.

अब राम मंदिर का मुद्दा एक नए दौर से गुज़र रहा है. हिंदुत्व की राजनीति की बात करने वाले लोगों के सामने भी नई चुनौती है.

इन लोगों को #धर्म की #विरासत और दूसरे के धर्म को लेकर #पागलपन ऐसी पीढ़ी के सामने लेकर जानी है जो #कम्युनिकेशन#टेक्नोलॉजी में माहिर है.

जब #अयोध्या_आंदोलन का आख़िरी चरण चल रहा था, वो दौर #आर्थिक सुधारों के बाद का दौर था. तब भारत #भूमंडलीकरण की शुरुआती सीढ़ियां चल रहा था.

इसके चलते नए मौके, नई चिंताएं और नई परेशानियां भी पैदा हुईं थीं. ऐसा माना जाता है कि #भूमंडलीकरण_ की प्रक्रिया में लोग #तकनीक और #आर्थिक तौर पर तो विकसित हुए लेकिन #संस्कृति के मामले में वो अब भी #अतीत से जुड़े हुए हैं.

भूमंडलीकरण के साये में पलने वाली पीढ़ी को भी इससे अलग नहीं रखा जा सकता.

दूसरे को लेकर पागलपन यानी गौरव का दौर
ऐसे में जो लोग अयोध्या के मुद्दे को उठा रहे हैं, हालात उनके पक्ष में हो सकते हैं. अभी ऐसा माहौल है, जिसमें दूसरे को लेकर पागलपन को गौरव से जोड़कर देखा जाता है.

‘हम हिंदू हैं.’ ‘हमारे साथ अन्याय हो रहा है’ जैसी बातें आसानी से फैलाई जा रही हैं. इस मद्देनज़र अयोध्या आंदोलन का ये नया चरण नई और युवा पीढ़ी के दिमाग में #साम्प्रदायिक_राजनीति के बीज बो सकता है.

राम मंदिर के मुद्दे के साथ हिंदू धर्म, परंपराओं और भारतीय इतिहास को इस नई पीढ़ी के सामने पेश किया जाएगा. चुनाव आकर चले जाएंगे. कोई भी पार्टी जीतेगी या हारेगी. लेकिन इस पूरे दौर से 18 की उम्र पार करने वाले युवाओं के दिमाग में जो छवि बनेगी, वो रह जाएगी. ये भारत के #भविष्य को भी प्रभावित करेगा.

ज़ाहिर है कि इसका फायदा सांस्कृतिक राजनीति करने वाले संगठन को मिलेगा. इस मामले में जो लोग हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं की राजनीति करेंगे, उनकी नज़र भविष्य में राजनीतिक सत्ता और सांस्कृतिक सत्ता पर होगी.

अयोध्या को लेकर जिस कदर राजनीति बढ़ रही है, ये साफ़ है कि धर्म की राजनीति की काट मुश्किल है. मंदिर बनेगा या नहीं, ये अलग मुद्दा है लेकिन आरएसएस का इस लड़ाई में कोई दूसरा प्रतिद्वंदी नहीं है.

आरएसएस ने अपनी राजनीतिक दिशा 30 साल पहले तब साफ़ कर दी थी. अब जब ये राजनीति एक बार फिर कदम बढ़ा रही है, इसे रोकने वाला कोई नहीं है.

ऐसे में ये सवाल मन में रह जाता है कि क्या ये सब भविष्य में भारतीय लोकतंत्र के बिगड़ने के लक्षण नहीं हैं?